शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

श्री शीतलाष्टकं

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।।श्री शीतलाष्टकं ।।
।।श्री शीतलायै नमः।।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीशीतलास्तोत्रस्य महादेव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीशीतला देवता, लक्ष्मी (श्री) बीजम्, भवानी शक्तिः, सर्व-विस्फोटक-निवृत्यर्थे जपे विनियोगः ।।
ऋष्यादि-न्यासः- श्रीमहादेव ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीशीतला देवतायै नमः हृदि, लक्ष्मी (श्री) बीजाय नमः गुह्ये, भवानी शक्तये नमः पादयो, सर्व-विस्फोटक-निवृत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।।
ध्यानः-
ध्यायामि शीतलां देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम्।।
मानस-पूजनः-
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
मन्त्रः-
“ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः।।” (११ बार)
।।मूल-स्तोत्र।।
।।ईश्वर उवाच।।
वन्देऽहं शीतलां-देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम् ।
मार्जनी-कलशोपेतां, शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम् ।।१
वन्देऽहं शीतलां-देवीं, सर्व-रोग-भयापहाम् ।
यामासाद्य निवर्तन्ते, विस्फोटक-भयं महत् ।।२
शीतले शीतले चेति, यो ब्रूयाद् दाह-पीडितः ।
विस्फोटक-भयं घोरं, क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति ।।३
यस्त्वामुदक-मध्ये तु, ध्यात्वा पूजयते नरः ।
विस्फोटक-भयं घोरं, गृहे तस्य न जायते ।।४
शीतले ! ज्वर-दग्धस्य पूति-गन्ध-युतस्य च ।
प्रणष्ट-चक्षुषां पुंसां , त्वामाहुः जीवनौषधम् ।।५
शीतले ! तनुजान् रोगान्, नृणां हरसि दुस्त्यजान् ।
विस्फोटक-विदीर्णानां, त्वमेकाऽमृत-वर्षिणी ।।६
गल-गण्ड-ग्रहा-रोगा, ये चान्ये दारुणा नृणाम् ।
त्वदनुध्यान-मात्रेण, शीतले! यान्ति सङ्क्षयम् ।।७
न मन्त्रो नौषधं तस्य, पाप-रोगस्य विद्यते ।
त्वामेकां शीतले! धात्री, नान्यां पश्यामि देवताम् ।।८
।।फल-श्रुति।।
मृणाल-तन्तु-सदृशीं, नाभि-हृन्मध्य-संस्थिताम् ।
यस्त्वां चिन्तयते देवि ! तस्य मृत्युर्न जायते ।।९
अष्टकं शीतलादेव्या यो नरः प्रपठेत्सदा ।
विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ।।१०
श्रोतव्यं पठितव्यं च श्रद्धाभाक्तिसमन्वितैः ।
उपसर्गविनाशाय परं स्वस्त्ययनं महत् ।।११
शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता ।
शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः ।।१२
रासभो गर्दभश्चैव खरो वैशाखनन्दनः ।
शीतलावाहनश्चैव दूर्वाकन्दनिकृन्तनः ।।१३
एतानि खरनामानि शीतलाग्रे तु यः पठेत् ।
तस्य गेहे शिशूनां च शीतलारुङ् न जायते ।।१४
शीतलाष्टकमेवेदं न देयं यस्यकस्यचित् ।
दातव्यं च सदा तस्मै श्रद्धाभक्तियुताय वै ।।१५
।।इति श्रीस्कन्दपुराणे शीतलाष्टकं सम्पूर्णम् ।।

शनि वज्र पञ्जर कवच

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शनि वज्र पञ्जर कवच
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीशनैश्चर-कवच-स्तोत्र-मन्त्रस्य कश्यप ऋषिः, अनुष्टुप् छन्द, शनैश्चरो देवता, शीं शक्तिः, शूं कीलकम्, शनैश्चर-प्रीत्यर्थं जपे विनियोगः।।
नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान्।
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः सदा मम स्याद्वरदः प्रशान्तः।।१
ब्रह्मोवाच-
श्रृणुषवमृषयः सर्वे शनिपीड़ाहरं महप्।
कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम्।।२
कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम्।
शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम्।।३
ॐ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनंदनः।
नेत्रे छायात्मजः पातु, पातु कर्णौ यमानुजः।।४
नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करः सदा।
स्निग्ध-कंठस्च मे कंठं भुजौ पातु महाभुजः।।५
स्कंधौ पातु शनिश्चैव करौ पातु शुभप्रदः।
वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितस्तथा।।६
नाभिं ग्रहपतिः पातु मंदः पातु कटि तथा।
ऊरु ममांतकः पातु यमो जानुयुग्म तथा।।७
पादौ मंदगतिः पातु सर्वांगं पातु पिप्पलः।
अंगोपांगानि सर्वाणि रक्षेन्मे सूर्यनन्दनः।।८
फलश्रुति
इत्येतत्कवचं दिव्यं पठेत्सूर्यसुतस्य यः।
न तस्य जायते पीडा प्रोतो भवति सूर्यजः।।९
व्ययजन्मद्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोऽपि वा।
कलत्रस्थो गतो वापि सुप्रीतस्तु सदा शनिः।।१०
अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे।
कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित्।।११
इत्येतत्कवचं दिव्यं सौरेर्यन्निर्मितं पुरा।
द्वादशाष्टमजन्मस्थदोषान्नाशयते सदा।
जन्मलग्नस्थितान्दोषान् सर्वान्नाशयते प्रभुः।।१२
।।श्रीब्रह्माण्डपुराणे ब्रह्म-नारद-संवादे शनि-वज्र-पंजर-कवचं।।
श्री हनुमान चालिसाhanuman chalisa







hanuman

WD
दोहा :
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

चौपाई :
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै।
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बन्दन॥
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचंद्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै॥
अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥

दोहा :
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

शिव रुद्राष्टक  shiwa rudrastak

रुद्राष्टक स्तोत्र महाज्ञानी लंकेश्वर महाराज  रावणद्वारा भगवान शिवलाइ प्रशन्न पार्न रचीत हो  

मूल पाठ


नमामिशमीशान निर्वाण रूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं॥१॥
निजं निर्गुणं निर्किल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं॥२॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशं॥३॥
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोहं॥४॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गंभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं॥५॥
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेंदु कंठे भुजंगा॥६॥
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठ दयालं॥७॥
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥८॥
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥९॥
त्रय:शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेहं भवानीपतिं भावगम्यं॥१०॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥११॥
चिदानंदसंदोह मोहपहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥१२॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां॥१३॥
न तावत्सुखं शांति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥१४॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥१५॥
जरा जन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमाशीश शंभो॥१६॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥

अग्रेजी भाषान्तर

English transliteration

Shiv Rudrashtak

1. Namaamishamishaan Nirvaan Roopam
Vibhum Vyaapakam Brahm Ved Svaroopam

2. Nijam Nirgunam Nirvikalpam Niriham
Chidaakaashamaakaash Vaasam Bhajeham

3. Niraakaaram Onkaar Moolam Tureeyam
Gira Gyan Gotitamisham Gireesham

4. Karaalam Mahaakaal Kaalam Krapaalam
Gunaagaar Sansaar Paaram Natoham

5. Tushaaraadri Sankaash Gauram Gabhiram
Manobhoot Koti Prabha Shree Shariram

6. Sphuranmauli Kallolini Chaaru Ganga
Lasadbhaal Baalendu Kanthe Bhujanga

7. Chalatkundalam Bhroo Sunetram Vishaalam
Prasannaananam Neelkatham Dayaalam

8. Mrigaadhish Charmaambaram Mundmaalam
Priyam Shankaram Sarvnaatham Bhajaami

9. Prachandam Prakrashtam Pragalbham Paresham
Akhandam Ajam Bhanu Koti Prakaasham

10. Trayh Shool Nirmoolanam Shool Paanim
Bhajeham Bhavaanipatim Bhaavgamyam

11. Kalaateet Kalyan Kalpaantkaari
Sada Sajjanaanand Daata Puraari

12. Chidaanand Sandoh Mohaaphaari
Praseed Praseed Prabho Manmathaari

13. Na Yavad Umaanaath Paadaarvindam
Bhajaanteeh Loke Pare Va Naraanaam

14. Na Taavat Sukham Shaanti Santaap Naasham
Praseed Prabho Sarv Bhootaadhivaasam

15. Na Jaanaami Yogam Japam Naiv Poojaam
Natoham Sada Sarvda Shambhu Tubhyam

16. Jara Janm Duhkhaudh Taatapya Maanam
Prabho Paahi Aapannamaameesh Shambho

Rudraashtakam Idam Proktam Vipren Hartoshye
Ye Pathanti Nara Bhaktya Teshaam Shambhu Praseedati

रामचरितमानस:सुन्दरकाण्ड

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श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस

पञ्चम सोपान
सुन्दरकाण्ड

श्लोक
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्॥१॥
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥२॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥३॥
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥

दोहा- हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥१॥

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा॥

दोहा- राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥२॥

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥
छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै॥
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥१॥
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥२॥
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥३॥

दोहा- पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥३॥

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥

दोहा- तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥४॥

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥

दोहा- रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ॥५॥

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥

दोहा- तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥६॥

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥

दोहा- अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥७॥

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥

दोहा- निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥८॥

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥

दोहा- आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥९॥

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥

दोहा- भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद॥१०॥

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥
यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥

दोहा- जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥११॥

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई॥
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥

सोरठा- -कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ॥१२॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ॥
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥
नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें॥

दोहा- कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास॥
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥१३॥

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता॥
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥

दोहा- रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर॥१४॥

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥

दोहा- निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥१५॥

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥

दोहा- सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥१६॥

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥

दोहा- देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥१७॥

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥

दोहा- कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥१८॥

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥

दोहा- ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥१९॥

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥

दोहा- कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥२०॥

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥

दोहा- जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥२१॥

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥

दोहा- प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥२२॥

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू॥
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं॥
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥

दोहा- मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥२३॥

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥
दो-कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥२४॥
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता॥
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं॥

दोहा- हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जéा कपि बढ़ि लाग अकास॥२५॥

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥

दोहा- पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥२६॥

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥

दोहा- जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥२७॥

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा॥
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥

दोहा- जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥२८॥

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥

दोहा- प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥२९॥

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥

दोहा- नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥३०॥

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी॥
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥

दोहा- निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥३१॥

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥

दोहा- सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥३२॥

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥

दोहा- ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल॥३३॥

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥

दोहा- कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥३४॥

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा॥
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥

छंद- चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥१॥
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥२॥

दोहा- एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥३५॥

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु॥
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥
दो०–राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥३६॥

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही॥

दोहा- सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥३७॥

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता॥
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई॥
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥

दोहा- काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥३८॥

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥

दोहा- बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥३९(क)॥
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥३९(ख)॥

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥

दोहा- तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥४०॥

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई॥
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही॥
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥
दो०=रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥४१॥

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं॥
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई॥
दो०= जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥४२॥

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥
दो०=सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥४३॥

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई॥
दो०=उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत॥४४॥

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥

दोहा- श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥४५॥

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया॥

दोहा- तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥४६॥

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥
दो०–अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज॥४७॥

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही॥
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा॥
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥

दोहा- सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥४८॥

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥

दोहा- रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड॥४९(क)॥
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ॥४९(ख)॥

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥

दोहा- प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥५०॥

गणेशस्तोत्र

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श्रीगणेशाय नमः ।
नारद उवाच ।
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेनित्यं आयुःकामार्थसिद्धये ॥ १ ॥

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ २ ॥

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ ३ ॥

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४ ॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरः प्रभुः ॥ ५ ॥

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ ६ ॥

जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ ७ ॥

अष्टेभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८ ॥

॥ इति श्रीनारदपुराणे संकटनाशनं गणेशस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

गर्भ उपनिषद्

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॥ गर्भोपनिषत् १७ ॥
यद्गर्भोपनिषद्वेद्यं गर्भस्य स्वात्मबोधकम् ।
शरीरापह्नवात्सिद्धं स्वमात्रं कलये हरिम् ॥
ॐ सहनाववत्विति शान्तिः ॥
ॐ पञ्चात्मकं पञ्चसु वर्तमानं षडाश्रयं
षड्गुणयोगयुक्तम् ।
तत्सप्तधातु त्रिमलं द्वियोनि
चतुर्विधाहारमयं शरीरं भवति ॥
पञ्चात्मकमिति कस्मात् पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशमिति ।
अस्मिन्पञ्चात्मके
शरीरे का पृथिवी का आपः किं तेजः को वायुः किमाकाशम् ।
तत्र यत्कठिनं सा पृथिवी यद्द्रवं ता आपो यदुष्णं
तत्तेजो यत्सञ्चरति स वायुः यत्सुषिरं तदाकाशमित्युच्यते ॥
तत्र पृथिवी धारणे आपः पिण्डीकरणे तेजः प्रकाशने
वायुर्गमने आकाशमवकाशप्रदाने ।
पृथक् श्रोत्रे
शब्दोपलब्धौ त्वक् स्पर्शे चक्षुषी रूपे जिह्वा रसने
नासिकाऽऽघ्राणे उपस्थश्चानन्दनेऽपानमुत्सर्गे बुद्ध्या
बुद्ध्यति मनसा सङ्कल्पयति वाचा वदति ।
षडाश्रयमिति
कस्मात् मधुराम्ललवणतिक्तकटुकषायरसान्विन्दते ।
षड्जर्षभगान्धारमध्यमपञ्चमधैवतनिषादाश्चेति ।
इष्टानिष्टशब्दसंज्ञाः प्रतिविधाः सप्तविधा भवन्ति ॥ १ ॥
शुक्लो रक्तः कृष्णो धूम्रः पीतः कपिलः पाण्डुर इति ।
सप्तधातुमिति कस्मात् यदा देवदत्तस्य द्रव्यादिविषया
जायन्ते ॥ परस्परं सौम्यगुणत्वात् षड्विधो रसो
रसाच्छोणितं शोणितान्मांसं मांसान्मेदो मेदसः
स्नावा स्नाव्नोऽस्थीन्यस्थिभ्यो मज्जा मज्ज्ञः शुक्रं
शुक्रशोणितसंयोगादावर्तते गर्भो हृदि व्यवस्थां
नयति ।
हृदयेऽन्तराग्निः अग्निस्थाने पित्तं पित्तस्थाने
वायुः वायुस्थाने हृदयं प्राजापत्यात्क्रमात् ॥ २ ॥
ऋतुकाले संप्रयोगादेकरात्रोषितं कलिलं भवति
सप्तरात्रोषितं बुद्बुदं भवति अर्धमासाभ्यन्तरेण पिण्डो
भवति मासाभ्यन्तरेण कठिनो भवति मासद्वयेन शिरः
संपद्यते मासत्रयेण पादप्रवेशो भवति ।
अथ चतुर्थे मासे
जठरकटिप्रदेशो भवति ।
पञ्चमे मासे पृष्ठवंशो भवति ।
षष्ठे मासे मुखनासिकाक्षिश्रोत्राणि भवन्ति ।
सप्तमे
मासे जीवेन संयुक्तो भवति ।
अष्टमे मासे सर्वसंपूर्णो
भवति ।
पितू रेतोऽतिरिक्तात् पुरुषो भवति ।
मातुः
रेतोऽतिरिक्तात्स्त्रियो भवन्त्युभयोर्बीजतुल्यत्वान्नपुंसको
भवति ।
व्याकुलितमनसोऽन्धाः खञ्जाः कुब्जा वामना
भवन्ति ।
अन्योन्यवायुपरिपीडितशुक्रद्वैध्याद्द्विधा
तनुः स्यात्ततो युग्माः प्रजायन्ते ॥ पञ्चात्मकः समर्थः
पञ्चात्मकतेजसेद्धरसश्च सम्यग्ज्ञानात् ध्यानात्
अक्षरमोङ्कारं चिन्तयति ।
तदेतदेकाक्षरं ज्ञात्वाऽष्टौ
प्रकृतयः षोडश विकाराः शरीरे तस्यैवे देहिनाम् ।
अथ
मात्राऽशितपीतनाडीसूत्रगतेन प्राण आप्यायते ।
अथ
नवमे मासि सर्वलक्षणसंपूर्णो भवति पूर्वजातीः स्मरति
कृताकृतं च कर्म विभाति शुभाशुभं च कर्म विन्दति ॥ ३ ॥
नानायोनिसहस्राणि दृष्ट्वा चैव ततो मया ।
आहारा विविधा भुक्ताः पीताश्च विविधाः स्तनाः ॥
जातस्यैव मृतस्यैव जन्म चैव पुनः पुनः ।
अहो दुःखोदधौ मग्नः न पश्यामि प्रतिक्रियाम् ॥
यन्मया परिजनस्यार्थे कृतं कर्म शुभाशुभम् ।
एकाकी तेन दह्यामि गतास्ते फलभोगिनः ॥
यदि योन्यां प्रमुञ्चामि सांख्यं योगं समाश्रये ।
अशुभक्षयकर्तारं फलमुक्तिप्रदायकम् ॥
यदि योन्यां प्रमुञ्चामि तं प्रपद्ये महेश्वरम् ।
अशुभक्षयकर्तारं फलमुक्तिप्रदायकम् ॥
यदि योन्यां प्रमुञ्चामि तं प्रपद्ये
भगवन्तं नारायणं देवम् ।
अशुभक्षयकर्तारं फलमुक्तिप्रदायकम् ।
यदि योन्यां प्रमुञ्चामि ध्याये ब्रह्म सनातनम् ॥
अथ जन्तुः स्त्रीयोनिशतं योनिद्वारि
संप्राप्तो यन्त्रेणापीड्यमानो महता दुःखेन जातमात्रस्तु
वैष्णवेन वायुना संस्पृश्यते तदा न स्मरति जन्ममरणं
न च कर्म शुभाशुभम् ॥ ४ ॥
शरीरमिति कस्मात्
साक्षादग्नयो ह्यत्र श्रियन्ते ज्ञानाग्निर्दर्शनाग्निः
कोष्ठाग्निरिति ।
तत्र कोष्ठाग्निर्नामाशितपीतलेह्यचोष्यं
पचतीति ।
दर्शनाग्नी रूपादीनां दर्शनं करोति ।
ज्ञानाग्निः शुभाशुभं च कर्म विन्दति ।
तत्र त्रीणि
स्थानानि भवन्ति हृदये दक्षिणाग्निरुदरे गार्हपत्यं
मुखमाहवनीयमात्मा यजमानो बुद्धिं पत्नीं निधाय
मनो ब्रह्मा लोभादयः पशवो धृतिर्दीक्षा सन्तोषश्च
बुद्धीन्द्रियाणि यज्ञपात्राणि कर्मेन्द्रियाणि हवींषि शिरः
कपालं केशा दर्भा मुखमन्तर्वेदिः चतुष्कपालं
शिरः षोडश पार्श्वदन्तोष्ठपटलानि सप्तोत्तरं
मर्मशतं साशीतिकं सन्धिशतं सनवकं स्नायुशतं
सप्त शिरासतानि पञ्च मज्जाशतानि अस्थीनि च ह
वै त्रीणि शतानि षष्टिश्चार्धचतस्रो रोमाणि कोट्यो
हृदयं पलान्यष्टौ द्वादश पलानि जिह्वा पित्तप्रस्थं
कफस्याढकं शुक्लं कुडवं मेदः प्रस्थौ द्वावनियतं
मूत्रपुरीषमाहारपरिमाणात् ।
पैप्पलादं मोक्षशास्त्रं
परिसमाप्तं पैप्पलादं मोक्षशास्त्रं परिसमाप्तमिति ॥
ॐ
सह नाववत्विति शान्तिः ॥
इति गर्भोपनिषत्समाप्ता ॥

गणपत्यथर्वशीर्ष

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॥ श्री गणपत्यथर्वशीर्ष ॥
॥ शान्ति पाठ ॥

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः । व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ तन्मामवतु तद् वक्तारमवतु अवतु माम् अवतु वक्तारम् ।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥

॥ उपनिषत् ॥

हरिः ॐ नमस्ते गणपतये ।  त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ॥
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि । त्वमेव केवलं धर्ताऽसि ॥
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि । त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ॥
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥ १ ॥ 
॥ स्वरूप तत्त्व ॥

ऋतं वच्मि सत्यं वच्मि अव त्वं माम् । अव वक्तारम् ॥
अव श्रोतारम् । अव दातारम् ॥ अव धातारम् ।
अवानूचानमव शिष्यम् ॥ अव पश्चात्तात् ।
अव पुरस्तात् ॥ अवोत्तरात्तात् ।
अव दक्षिणात्तात् ॥ अव चोर्ध्वात्तात् ।
अवाधरात्तात् ॥ सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात् ॥ ३ ॥

त्वं वाङ्ग्मयस्त्वं चिन्मयः । त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममयः ॥
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि । त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ॥
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥ ४ ॥

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते । सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति ॥
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति । सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति ॥
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः ॥ त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥ ५ ॥

त्वं गुणत्रयातीतः त्वमवस्थात्रयातीतः ।  त्वं देहत्रयातीतः ॥
त्वं कालत्रयातीतः । त्वं मूलाधारः स्थिथोऽसि नित्यम् ॥
त्वं शक्तित्रयात्मकः । त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम् ॥
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम् ॥ ६ ॥

॥ गणेश मंत्र ॥

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरम् ।
अनुस्वारः परतरः ॥
अर्धेन्दुलसितम् ।
तारेण ऋद्धम् ॥
एतत्तव मनुस्वरूपम् ।
गकारः पूर्वरूपम् ॥
अकारो मध्यमरूपम् ।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपम् ॥
बिन्दुरुत्तररूपम् ।
नादः संधानम् ॥
संहितासंधिः ।
सैषा गणेशविद्या ॥
गणकऋषिः ।
निचृद्गायत्रीच्छंदः ॥
गणपतिर्देवता ॥
ॐ गं गणपतये नमः ॥ ७ ॥

॥ गणेश गायात्री ॥

एकदंताय विद्महे ।
वक्रतुण्डाय धीमहि ॥
तन्नो दंतिः प्रचोदयात् ॥ ८ ॥

॥ गणेश रूप ॥

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम् ।
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् ।
रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुष्पैः सुपूजितम् ॥
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् ।
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् ॥
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ ९ ॥

॥ अष्ट नाम गणपति ॥

नमो व्रातपतये ।
नमो गणपतये ॥
नमः प्रमथपतये ।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय ॥
विघ्ननाशिने शिवसुताय ।
श्रीवरदमूर्तये नमो नमः ॥ १० ॥

॥ फलश्रुति ॥

एतदथर्वशीर्षं योऽधीते ।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
स सर्वतः सुखमेधते ।
स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते ॥
स पंचमहापापात्प्रमुच्यते ।
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ॥
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति ।
सायंप्रातः प्रयुंजानो अपापो भवति ॥
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति ॥
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् ।
यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति ॥
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ॥ ११ ॥

अनेन गणपतिमभिषिंचति स वाग्मी भवति ॥
चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति ।
स यशोवान् भवति ।
इत्यथर्वणवाक्यम् ॥
ब्रह्माद्याचरणं विद्यात् न बिभेति कदाचनेति ॥ १२ ॥

यो दूर्वांकुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति ।
यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति ॥
स मेधावान् भवति ।
यो मोदकसहस्रेण यजति ॥
स वाञ्छितफलमवाप्नोति ।
यः साज्यसमिद्भिर्यजति ॥
स सर्वं लभते स सर्वं लभते ॥ १३ ॥

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति ।
सूर्यगृहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमंत्रो भवति ॥
महाविघ्नात्प्रमुच्यते ।
महादोषात्प्रमुच्यते ॥
महापापात् प्रमुच्यते ।
स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति ॥
य एवं वेद इत्युपनिषत् ॥ १४ ॥

॥ शान्ति मंत्र ॥

ॐ सहनाववतु ।
सहनौभुनक्तु ॥
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥

॥ इति श्रीगणपत्यथर्वशीर्षं समाप्तम् ॥

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

कृष्णाष्टकम्

॥ कृष्णाष्टकम् ॥

श्रियाश्लिष्टो विष्णुः स्थिरचरगुरुर्वेदविषयो

धियां साक्षी शुद्धो हरिरसुरहन्ताब्जनयनः ।
गदी शङ्खी चक्री विमलवनमाली स्थिररुचिः

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ १ ॥
यतः सर्वं जातं वियदनिलमुख्यं जगदिदम्

स्थितौ निःशेषं योऽवति निजसुखांशेन मधुहा ।
लये सर्वं स्वस्मिन्हरति कलया यस्तु स विभुः

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ २ ॥
असूनायम्यादौ यमनियममुख्यैः सुकरणै-

र्र्निरुद्ध्येदं चित्तं हृदि विलयमानीय सकलम् ।
यमीड्यं पश्यन्ति प्रवरमतयो मायिनमसौ

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ३ ॥
पृथिव्यां तिष्ठन्यो यमयति महीं वेद न धरा

यमित्यादौ वेदो वदति जगतामीशममलम् ।
नियन्तारं ध्येयं मुनिसुरनृणां मोक्षदमसौ

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ४ ॥
महेन्द्रादिर्देवो जयति दितिजान्यस्य बलतो

न कस्य स्वातन्त्र्यं क्वचिदपि कृतौ यत्कृतिमुते ।
बलारातेर्गर्वं परिहरति योऽसौ विजयिनः

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ५ ॥
विना यस्य ध्यानं व्रजति पशुतां सूकरमुखाम्

विना यस्य ज्ञानं जनिमृतिभयं याति जनता ।
विना यस्य स्मृत्या कृमिशतजनिं याति स विभुः

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ६ ॥
नरातङ्कोट्टङ्कः शरणशरणो भ्रान्तिहरणो

घनश्यामो वामो व्रजशिशुवयस्योऽर्जुनसखः ।
स्वयंभूर्भूतानां जनक उचिताचारसुखदः

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ७ ॥
यदा धर्मग्लानिर्भवति जगतां क्षोभकरणी

तदा लोकस्वामी प्रकटितवपुः सेतुधृदजः ।
सतां धाता स्वच्छो निगमगणगीतो व्रजपतिः

शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥ ८ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ कृष्णाष्टकं संपूर्णम् ॥
 
 श्री अन्नपुर्ण स्तोत्रम
 
श्री पुण्यडट कम द्वारा 
नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१॥

नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्‍वक्षोजकुम्भान्तरी ।
काश्मीरागुरूवासिता रुचिकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥२॥

योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्माथनिष्ठाकरी चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।
सर्वैश्वर्यसमस्तवांछनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥३॥

कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमाशङ्करी कौमारी निगमार्थगोचरकरी ॐकारबीजाक्षरी ।
मोक्षव्दारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥४॥

दृश्यादृश्यविभूतवाहनकरी ब्रम्हाण्डभाण्डोदरी लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।
श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥५॥

उर्वी सर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरी वेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी ।
सर्वानन्दकरी सदाशुभकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥६॥

आदिक्षान्तिसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी काश्मीरात्रिपुरेश्वरी त्रिनयनी नित्याङ्कुरा शर्वरी ।
कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥७॥

देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी वामा स्वादुपयोगधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।
भक्ताभीष्टकरी दशाशुभहरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥८॥

चन्द्रार्कालयकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी चन्द्रार्काग्निसमानकुंडलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।
मालापुस्तकपाशसांकुशधरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥९॥

क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरी श्रीधरी ।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१०॥

भगवति भवरोगात्पीडितं दुष्कृतोत्थात् सुतदुहितृकलत्रोपद्रवेणानुयातम् ।
विलसदमृतदृष्ट्या वीक्ष्य विभ्रान्तचित्तं सकलभुवनमातस्त्राहि मामों नमस्ते ॥११॥

माहेश्वरीमाश्रितकल्पवल्लीमहम्भवोच्छेदकरीं भवानींम् ।
क्षुधार्तजायातनयाद्युपेतस्त्वामन्नपूर्णे शरणं प्रपद्ये ॥१२॥

दारिद्र्यदावानलदह्यमानं पाह्यन्नपूर्णे गिरिराजकन्ये । 
कृपाम्बुधौ मज्जय मां त्वदीये त्वत्पादपद्मार्पितचित्तवृत्तिम् ॥१३॥

अन्नपूर्णे सदा पूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्‍ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥१४॥

माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वेदेशो भुवनत्रयम् ॥१५॥

इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितमन्नपूर्णास्तोत्रं संपूर्णम् ।

नारद भक्ति सूत्र

प्रथमोऽध्यायः

अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः । 
 सा त्वस्मिन परप्रेमरूपा ।
 अमृतस्वरूपा च । 
 यल्लब्धवा पुमान सिध्दो भवति अमृतो भवति तृप्तो भवति ।
 यत्प्राप्य न किन्चित वाञ्छति न शोचति न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति ।
 यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति ।
 सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात ।
 नेरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यासः ।
 तस्मिन्ननन्यता तद्विरोधिषूदासीनता ।
 लोकवेदेषु तदनुकूलाचरणं तदविरोधिषूदासीनता ।
 भवतु निश्चयदाढर्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम् ।
 अन्यथा पातित्यशङ्कया ।
 लोकोऽपि तावदेव भोजनादि व्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि ।
 तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नानामतभेदात् ।
 पूजादिष्वनुराग इति पराशर्यः ।
 कथादिष्विति गर्गः ।
 आत्मरत्यविरोधेनेति शाण्डिल्यः ।
 नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति ।
 अस्त्येवमेवम् । 
 यथा व्रजगोपिकानाम ।
 तत्रापि न माहात्म्यज्ञानविस्मृत्यपवादः ।
 तद्विहीनं जाराणामिव । 
 नास्त्येव तस्मिन तत्सुखसुखित्वम् ।

द्वितीयोऽध्यायः

सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा ।
 फलरूपत्त्वात् ।
 ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वात् दैन्यप्रियत्वात् च ।
 तस्याः ज्ञानमेव साधनमित्येके ।
 अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये ।
 स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमारः । 
 राजगृहभोजनादिषू तथैव दृष्टत्वात् । 
 न तेन राजा परितोषः क्षुच्छान्तिर्वा ।
 तस्मात् सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः ।

तृतियोऽध्यायः

तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्याः ।
 तत्तु विषयत्यागात् सङ्गत्यागात् च ।
 अव्यावृत्तभजनात् ।
 लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्तनात् ।
 मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद वा ।
 महत्सङ्गस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च ।
 लभ्तेऽपि तत्कृपयैव ।
 तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात् ।
 तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम् । 
 दुस्सङ्गः सर्वथैव त्याज्यः ।
 कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशकारणत्वात् ।
 तरङगायिता अपीमे सङ्गात् समुत्रायन्ते ।
 कस्तरति कस्तरति मायाम् यः सङ्गं त्यजति यो महानुभाव् सेवते निर्ममो भवति ।
 यो विविक्तस्थानं सेवते यो लोकबन्धमुनमूनयति निस्त्रैगुण्यो भवति योगक्षेमं त्यजति । 
 यः कर्मफलं त्यजति कर्माणि सन्नयस्स्यति ततो निर्द्वन्द्वो भवति ।
 यो वेदानपि सन्नयस्यति केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते ।
 स तरति स तरति स लोकांस्तारयति ।

चतुर्थोऽध्यायः

अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम् ।
 मूकास्वादनवत् ।
 प्रकाशते क्वापि पात्रे ।
 गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानं अविच्छिन्नं सूक्ष्मतरं अनुभवरूपम् ।
 तत्प्राप्य तदेवावलोकति तदेव शृणोति तदेव भाषयति तदेव चिन्तयति ।
 गौणि त्रिधा गुणभेदाद् आर्तादिभेदाद् वा ।
 उत्तरस्मादुत्तरस्मात् पूर्व पूर्वा श्रेयाय भवति ।
 अन्य मात् सौलभं भक्तो ।
 प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात् स्वयं प्रमाणत्वात् ।
 शान्तिरूपात् परमानन्दरूपाच्च ।
 लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात् ।
 न तत्सिध्दौ लोकव्यवहरओ हेयः किन्तु फलत्यागः तत्साधनं च ।
 स्त्रिधननास्तिकचरित्रं न श्रवणीयम् ।
 अभिमानदम्भादिकं त्याज्यम् ।
 तदर्पिताखिलाचारः सन् कामक्रोधाभिमानादुकं तस्मिन्नेव करणीयम् ।
 त्रिरूपभङ्गपूर्वमकम् नित्यदास्यनित्यकान्ताभजनात्मकं प्रेम कार्य प्रेमैव कार्यम् ।

पञ्चमोऽध्यायः

भक्ता एकान्तिनो मुख्याः । 
 कण्ठावरोधरोमञ्चाश्रुभिः परस्परं लपमानाः पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च ।
 तीर्थिकुर्वन्ति तीर्थानि सुकर्मी कुर्वन्ति कर्माणि सच्छास्त्रिकुर्वन्ति शास्त्राणि ।
 तन्मयाः ।
 मोदन्ते पितरो नृत्यन्ति देवतः सनाथा चेयं भूर्भवति ।
 नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादि भेदः ।
 यतस्तदीयाः ।
 वादो नावलम्ब्यः ।
 बाहुल्यावकाशत्वाद अनियतत्त्वाच्च ।
 भक्तिशस्त्र्राणि मननीयानि तदुद्बोधकर्माणि करणीयानि ।
 सुखदुःखेच्छालाभादित्यके प्रतीक्ष्यमाणे क्षणार्धमपि व्यर्थ न नेयम् ।
 अहिंसासत्यशौचदयास्तिक्यादिचारित्रयाणि परिपालनीयानि ।
 सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तैः भगवानेव भजनीयः ।
 स कीर्त्यमानः शीघ्रमेवाविर्भवत्यनुभावयति भक्तान् ।
 त्रिसत्यस्य भक्तिरेव गरीयसी भक्तिरेव गरीयसी ।
 गुणमाहात्म्यासक्ति रूपासक्ति पूजासक्ति स्मरणासक्ति दास्यासक्ति 
 सख्यासक्ति वात्सल्यसक्ति कान्तासक्ति आत्मनिवेदनासक्ति तन्मयतासक्ति 
 परमविरहासक्ति रूपा एकधा अपि एकादशधा भवति ।
 इत्येवं वदन्ति जनजल्पनिर्भयाः एकमतः कुमार व्यास शुख शाण्डिल्य 
 गर्ग विष्णु कौण्डिन्य शेषोध्दवारुणि बलि हनुमद विभीषणादयो भक्त्याचार्याः ।
 य इदं नारदप्रोक्तं शिवानुशासनं विश्वसिति श्रध्दते स भक्तिमान् भवति सः प्रेष्टं 
 लभते सः प्रेष्टं लभते ।
॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥

भीष्म स्तुति

श्रीमद्भागवत महापुराण
किशोर शास्त्री
श्री भीष्म उवाच - 

इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वत पुङ्गवे विभूम्नि ।
स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः ।। ३२।।

त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने ।
वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ।। ३३ ।।

युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्कचलुलितश्रमवार्यलंकृतास्ये ।
मम निशितशरैर्विभिद्यमानत्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ।। ३४।।

सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य ।
स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा हृतवति पार्थ सखे रतिर्ममास्तु ।। ३५।।

व्यवहित पृथनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या।
कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ।। ३६।।

स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः ।
धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलत्गुः हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ।। ३७।।

शितविशिखहतोविशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे ।
प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः ।। ३८।।

विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे धृतहयरश्मिनि तच्छ्रियेक्षणीये।
भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षोः यमिह निरीक्ष्य हताः गताः सरूपम् ।। ३९।।

ललित गति विलास वल्गुहास प्रणय निरीक्षण कल्पितोरुमानाः ।
कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन् किल यस्य गोपवध्वः ।। ४०।।

मुनिगणनृपवर्यसंकुलेऽन्तः सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् ।
अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशि गोचर एष आविरात्मा ।। ४१।।

तमिममहमजं शरीरभाजां हृदिहृदि
धिष्टितमात्मकल्पितानाम् ।

प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ।। ४२।।


श्री सूत उवाच - 
कृष्ण एवं भगवति मनोवाग्दृष्टिवृत्तिभिः ।
आत्मन्यात्मानमावेश्य सोऽन्तः श्वासमुपारमत् ।। ४३।।


।। इति।।

आञ्जनेय कवचम्

श्री आञ्जनेय कवचम्
अस्य श्रीहनुमत्कवच स्तोत्रमहामन्त्रस्य । श्रीरामचन्द्र ऋषिः । गायत्रि छन्दः । श्रीहनुमान् परमात्मा देवता । मारुतात्मज इति बिजम् । अञ्जनासुनुरिति शक्तिः । श्री रामदूत हति कीलकम् । मम मानसाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।।

श्री रामचन्द्र उवाच । हनुमान् पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः । प्रतीच्यां पातु रक्षोघ्नः सौम्यां सागरतारणः ।।
ऊर्ध्वं में केसरी पातु विष्णुभक्तस्तु में ह्यधः । लंकाविदाहकः पातु सर्वापद्भयो निरन्तरम् ।।
सुग्रीवसचिवः पातु मस्तके वायुनन्दनः । फालं पातु महावीरः भ्रुवोर्मध्ये निरन्तरम् ।।
नेत्रे छायापहारी च पातु मां प्लवगेश्वरः । कपोलौ कर्णमूले तु पातु मे रामकिङ्करः ।।
नासायामञ्जनासुनुः पातु वक्त्रं हरीश्वरः । पातु कण्ठं च दैत्यारिः स्कन्धौ पातु सुरार्चितः ।।
भुजौ पातु महातेजाः करौ तु चरणायुधः । नखान नखायुधः पातु कुक्षौ पातु कपीश्वरः ।।
वक्षो मुद्रापहारी च पातु पार्श्वे महाभुजः । सीताशोकप्रहर्ता च स्तनौ पातु निरन्तरम् ।।
लंकाभयंकर पातु पृष्टदेशे निरन्तरम् । नाभिं श्रीरामदासो मे कटिं पातु समीरजः ।।
गुह्यं पातु महाप्राज्ञः सक्थिनी च शिवप्रियः । उरु च जानुनी पातु लंकाप्रसादभंजनः ।।
जंघे पातु कपिश्रेष्ठः गुल्फं पातु महाबलः । अचलोद्धारकः पातु पादौ भास्करसन्निभः ।।
अंगान्यमितसत्वाढयः पातु पादांगुलिस्सदा । सर्वांगानि महाशूरः पातु रोमाणि चात्मवान् ।।
हनुमत्कवचं यस्तु पठेत विद्वान विचक्षणः । स एव पुरुषश्रेष्ठः भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।।
श्रिकालं एककालं वा पठेत मासत्रयं नरः । सर्वान् रिपुन् क्षणात् जित्वा स पुमान श्रियं आप्नुयात् ।।
अर्धरात्रौ जले स्थित्वा सप्तवारं पठेत यदि । क्षयापस्मारकुष्ठकादि तापत्रयनिवारणम् ।।
अश्वत्थमूले अर्कवारे स्थित्वा पठति यः पुमान् । अचलां श्रियमाप्नोति संग्रामे विजयी भवेत ।।
सर्वरोगाः क्षयं यान्ति सर्वसिद्धिप्रदायकम् । यः करे धारयेन्नित्यं रामरक्षासमन्वितम् ।।
रामरक्षां पठेद्यस्तु हनुमत्कवचं विना । अरण्ये रुदितं तेन स्तोत्रपाठञ्च निष्फलम् ।।
सर्वदुःखभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत । अहोरात्रं पठेद्यस्तु शुचिः प्रयतमानसः ।।
मुच्येत नात्र सन्देहः कारागृहगतो नरः । पापोपपातकान्मर्त्यः मुच्यते नात्र संशयः ।।
यो वारान्निधिमल्पपल्वलमिवोल्लंघ्य प्रतापान्वितः वैदेहीहीघनशोकतापहरणो वैकुण्ठभक्तिप्रियः । अक्षघ्नो जितराक्षसेश्वरमहादर्पापहारी रणे सो अयं वानरपुंगवो अवतु सदा त्वस्मिन समीरात्मजः ।।
।। इति श्रीआञ्जनेय कवचं संपूर्णम् ।।

श्री रामरक्षा स्तोत्रम


॥ ऊँ श्रीगणेशाय् नमः ॥ अस्य् श्रीराम् रक्षा स्तोत्रमन्त्रस्य। बुधकौशिक् ऋषिः । श्रीसीतारामचंद्रो देवता । अनुष्टुप् छंदः । सीता शक्तिः। श्रीमद् हनुमान् कीलकम्। श्रीरामचंद्र्प्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः॥

॥अथ धयानम् ॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बध्दपद्मासनस्थम् । पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्। वामांकारुढ सीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभम् । नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामंडनं रामचंद्रम्॥
॥इति ध्यानम्॥

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥१॥

ध्यात्वा नीलोत्पलशयामं रामं राजीवलोचनम् । जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमंडितम्॥२॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् । स्वलील्या जगत्रातुं आविर्भूतं अजं विभुम्॥३॥

रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्। शिरोमे राघवः पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियश्रुती घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥

जिव्हां विधानिधिः पातु कंठं भरतवंदित:। स्कंधौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेश्कार्मुक:॥६॥

करौ सीतापतिः पातु ह्रूदयं जामदग्न्यजित्। मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु:। ऊरु रघुत्तम: पातु रक्षःकुलविनाशकृत्॥८॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुक्रुती पठेत्। स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥१०॥

पातालभुतलव्योमचारिणश्छ्धचारिण:। न द्रुष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि:।११॥

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्। नरो न लिप्य्ते पापे: भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥१२॥

जगजैत्रैमत्रेण राम्नाम्नाभिरक्षितम्। य: कंठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिध्दय: ॥१३॥

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्। अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमंगलम ॥१४॥

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षांमिमां हर:। तथा लिखितवान् प्रात: प्रभुध्दो बुधकौशिक: ॥१५॥

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम् । अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु: ॥१६॥

तरुणौ रुपसंपन्नौ सुकुमरौ महाबलौ। पुंडरीकविशालाक्षौ चिरकृष्णाजिनाम्बरौ॥१७॥

फलमुलाशिनौ दान्तौ तापसौ बृह्मचारिणौ। पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्षमणौ ॥१८॥

शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठो सर्वधनुष्मताम्। रक्ष: कुलनिहंतारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ॥१९॥

आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंसंगिनौ। रक्षणाय मम रामलक्षमणावग्रत: पथि सदैव गचछताम् ॥२०॥

सन्नध्द: कवची खड्गी चापबाणधरो युवा। गच्छन्मनोरथोस्माकं राम: पातु सलक्षमण:॥२१॥

रामो दाशरथि: शुरो लक्षमणानुचरो बली। काकुत्स्थ: पुरुष: पुर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम:॥२२॥

वेदान्तवेधो यज्ञेश: पुराणपुरुषोतम:। जानकीवल्लभ: श्रीमान् अप्रमेय प्रराक्रम: ॥२३॥

इत्येतानि जपन्नित्यं मड्भ्क्त: श्रध्दयान्वित:। अश्वमेधाधिकं पुण्यं स्ंप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥

रामं लक्षमणपुर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरम् । काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्। राजेंद्रम् सत्यसंधं दशरथतनयं शयमलं शांतमूर्तिम्। वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥२६॥

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथय सीताया: पतये नम: ॥२७॥

श्रीराम राम रघुनंदन राम राम। श्रीराम राम भरताग्रज राम् राम्। श्रीराम राम रणकर्कश राम राम। श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥

श्रीरामचंद्रचरणौ मनसा स्मरामि। श्रीरामचंद्रचरणौ वचसा गृणामि। श्रीरामचंद्रचरणौ शिरसा नममि। श्रीरामचंद्रचरणौ शरंण प्रपघे॥२९॥ माता रामो मत्पिता रामचंद्र: । स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र:। सर्वस्वं मे रामचंद्रो दयालु:। नान्य्ं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

दक्षिणे लक्षमणो यस्य वामे तु जनकात्मजा। पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम् ॥३१॥ लोकाभिरामं रणरंगधीरम्। राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। कारुण्यरुप्ं करुणाकरं तम्। श्रीरामचंद्रम् शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगम्। जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयुथमुख्यम्। श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥

कुजंतं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम्। आरुह्य काविताशाखां वंदे वाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥ आपदां अपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्। लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥३५॥ भर्जनं भवबीजानां अर्जनं सुखसमप्दाम् । तर्जनं यमदूतानां राम् रामेति गर्जनम् ॥३६॥

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे। रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम:। रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोस्म्यहम्। रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुध्दर् ॥३७॥

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥

इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ॥
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वेंकटेश सुप्रभातम्

From श्री पुण्य

 मूल पाठ


॥अथ श्री वेङ्कटेश सुप्रभातम्॥

ॐ  कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते
उत्तिष्ठ नरशार्दूला कर्तव्यं दैवमाह्निकम्॥१

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज
उत्तिष्ठ कमलाकान्ता त्रैलोक्यं मङ्गलं कुरु॥२

मातस्समस्तजगतां मधुकैटभारेः
वक्षोविहारिणि मनोहरदिव्यमूर्ते।
श्रीस्वामिनि श्रितजनप्रियदानशीले
श्रीवेङ्कटेशदयिते तव सुप्रभातम्॥३

तव सुप्रभातमरविन्दलोचने
भवतु प्रसन्नमुखचन्द्रमण्डले।
विधिशङ्करेन्द्रवनिताभिरर्चिते
वृषशैलनाथदयिते दयानिधे॥४

अत्र्यादिसप्तऋषयस्समुपास्य सन्ध्यां
आकाशसिन्धुकमलानि मनोहराणि।
आदाय पादयुगमर्चयितुं प्रपन्नाः
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम्॥५

पञ्चाननाब्जभवषण्मुखवासवाद्याः
त्रैविक्रमादिचरितं विबुधाः स्तुवन्ति।
भाषापतिः पठति वासर शुद्धिमारात्
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम्॥६

ईषत्प्रफुल्लसरसीरुहनारिकेल
पूगद्रुमादिसुमनोहरपालिकानां।
आवाति मन्दमनिलस्सह दिव्यगन्धैः
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम्॥७

उन्मील्य नेत्रयुगमुत्तम पंजरस्थाः
पात्रावशिष्टकदलीफलपायसानि।
भुक्त्वा सलीलमथ केलिशुकाः पठन्ति
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम्॥८

तन्त्रीप्रकर्षमधुरस्वनया विपञ्च्या
गायत्यनन्तिचरितं तव नारदोऽपि।
भाषासमग्रमसकृत्करचाररम्यं
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम्॥९

भृङ्गावली च मकरन्दरसानुविद्ध
झङ्कारगीत निनदैःसह सेवनाय।
निर्यात्युपान्तसरसीकमलोदरेभ्यः
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम्॥१०

योषागणेन वरदध्निविमथ्यमाने
घोषालयेषु दधिमन्थनतीव्रघोषाः।
रोषात्कलिं विदधतेककुभश्च कुम्भाः
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम्॥११

पद्मेशमित्रशतपत्रगतालिवर्गाः
हर्तुं श्रियं कुवलयस्य निजाङ्गलक्ष्म्या।
भेरीनिनादमिव बिभ्रति तीव्रनादं
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम्॥१२

श्रीमन्नभीष्ट वरदाखिललोकबन्धो
श्रीश्रीनिवास जगदेकदयैकसिन्धो।
श्रीदेवतागृहभुजान्तर दिव्य मूर्ते
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥१३

श्रीस्वामिपुष्करिणिकाऽऽप्लवनिर्मलाङ्गाः
श्रेयोऽर्थिनो हरविरिंचसनन्दनाद्याः।
द्वारे वसन्ति वरवेत्रहतोत्तमाङ्गाः
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥१४

श्री शेषशैल गरुडाचल वेङ्कटाद्रि
नारायणाद्रि वृषभाद्रि वृषाद्रि मुख्याम्।
आख्याम् त्वदीय वसतेरनिशं वदन्ति
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥१५

सेवापराः शिवसुरेशकृशानुधर्म
रक्षोऽम्बुनाथ पवमान धनाधिनाथाः।
बद्धांजलि प्रविलसन्निजशीर्ष देशाः
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥१६

घाटीषु ते विहगराज मृगाधिराज-
नागाधिराज गजराज हयाधिराजाः।
स्वस्वाधिकार महिमाधिकमर्थयन्ते
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥१७

सूर्येन्दु भौम बुध वाक्पति काव्य सौरि
स्वर्भानु केतु दिविषत्परिषत्प्रधानाः।
त्वद्दास दास चरमावधि दासदासाः
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥१८

त्वत्पादधूलि भरितस्फुरितोत्तमाङ्गाः
स्वर्गापवर्ग निरपेक्ष निजान्तरङ्गाः।
कल्पागमाऽऽकलनयाऽऽकुलतां लभन्ते
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥१९

त्वद्गोपुराग्रशिखराणि निरीक्षमाणाः
स्वर्गापवर्गपदवीं परमां श्रयन्तः।
मर्त्या मनुष्यभुवने मतिमाश्रयन्ते
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥२०

श्रीभूमिनायक दयादिगुणामृताब्धे
देवाधिदेव जगदेकशरण्यमूर्ते।
श्रीमन्ननन्त गरुडादिभिरर्चिताङ्घ्रे
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥२१

श्रीपद्मनाभ पुरुषोत्तम वासुदेव
वैकुण्ठ माधव जनार्दन चक्रपाणे।
श्रीवत्सचिन्ह शरणागतपारिजात
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥२२

कन्दर्पदर्प हरसुन्दर दिव्यमूर्ते
कान्ताकुचाम्बुरुह कुट्मल लोलदृष्टे।
कल्याणनिर्मलगुणाकर दिव्यकीर्ते
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥२३

मीनाकृते कमठ कोल नृसिंह वर्णिन्
स्वामिन् परश्वथतपोधन रामचन्द्र।
शेषांशराम यदुनन्दन कल्किरूप
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥२४

एला लवङ्ग घनसार सुगन्धि तीर्थं
दिव्यं वियत्सरिति हेमघटेषु पूर्णम्।
धृत्वाऽऽद्य वैदिक शिखामणयः प्रहृष्टाः
तिष्ठन्ति वेङ्कटपते तव सुप्रभातम्॥२५

भास्वानुदेति विकचानि सरोरुहाणि
संपूरयन्ति निनदैः ककुभो विहङ्गाः।
श्रीवैष्णवास्सततमर्थित मङ्गलास्ते
धामाऽऽश्रयन्ति तव वेङ्कट सुप्रभातम्॥२६

ब्रह्मादयः सुरवरास्समहर्षयस्ते
सन्तस्सनन्दन मुखास्त्वथ योगिवर्याः।
धामान्तिके तव हि मङ्गलवस्तु हस्ताः
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥२७

लक्ष्मीनिवास निरवद्यगुणैकसिन्धो
संसार सागर समुत्तरणैकसेतो।
वेदान्तवेद्यनिजवैभव भक्तभोग्य
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम्॥२८

इत्थं वृषाचलपतेरिह सुप्रभातम्
ये मानवाः प्रतिदिनं पठितुं प्रवृत्ताः।
तेषां प्रभातसमये स्मृतिरङ्गभाजां
प्रज्ञां परार्थसुलभां परमां प्रसूते॥२९

॥इति वेङ्कटेश सुप्रभातम्॥

श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्‌

From श्री पुण्यडट कम

मूल पाठ



ॐ सकल सौभाग्यदायक
॥श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्‌॥


शुक्लांबरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत सर्वविघ्नोपशान्तये॥१॥
यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम्‌।
विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वकसेनं तमाश्रये॥२॥
व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम्‌।
पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम॥३॥
व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः॥४॥
अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने।
सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे॥५॥
यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात्।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे॥६॥
ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे।

श्रीवैशम्पायन उवाच ---
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत॥७॥

युधिष्ठिर उवाच ---
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्॥८॥
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्॥९॥

भीष्म उवाच ---
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्।
स्तुवन नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः॥१०॥
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम्।
ध्यायन स्तुवन नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च॥११॥
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम्।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत्॥१२॥
ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम्।
लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम्॥१३॥
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा॥१४॥
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः।
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम्॥१५॥
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम्।
दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता॥१६॥
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये॥१७॥
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते।
विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम्॥१८॥
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये॥१९॥
ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः।
छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः॥२०॥
अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः।
त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियोज्यते॥२१॥
विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम्‌।
अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमं॥२२॥

॥पूर्वन्यासः॥
श्रीवेदव्यास उवाच ---
ॐ अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य॥
श्री वेदव्यासो भगवान ऋषिः।
अनुष्टुप् छन्दः।
श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता।  अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम्‌।  देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः।
उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः।  शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम्।
शार्ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम्।  रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम्‌।  त्रिसामा सामगः सामेति कवचम्।
आनन्दं परब्रह्मेति योनिः।  ऋतुः सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः॥  श्रीविश्वरूप इति ध्यानम्‌।
श्रीमहाविष्णुप्रीत्यर्थं सहस्रनामजपे विनियोगः॥

॥अथ न्यासः॥
ॐ शिरसि वेदव्यासऋषये नमः।  मुखे अनुष्टुप्छन्दसे नमः।
हृदि श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः।  गुह्ये अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजाय नमः।
पादयोर्देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तये नमः।  सर्वाङ्गे शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकाय नमः।
करसंपूटे मम श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः॥  इति ऋषयादिन्यासः॥

॥अथ करन्यासः॥
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः।  अमृतांशूद्भवो भानुरिति तर्जनीभ्यां नमः।
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति मध्यमाभ्यां नमः।  सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इत्यनामिकाभ्यां नमः।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति कनिष्ठिकाभ्यां नमः।  रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
इति करन्यासः॥

॥अथ षडङ्गन्यासः॥
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इति हृदयाय नमः।  अमृतांशूद्भवो भानुरिति शिरसे स्वाहा।
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति शिखायै वषट्।  सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इति कवचाय हुम्।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति नेत्रत्रयाय वौषट्।  रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इत्यस्त्राय फट्।
इति षडङ्गन्यासः॥

श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे विष्णोर्दिव्यसहस्रनामजपमहं करिष्ये इति सङ्कल्पः।

॥अथ ध्यानम्।

क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकतेर्मौक्तिकानां
मालाकॢप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः।
शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूष वर्षैः
आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदा शङ्खपाणिर्मुकुन्दः॥१॥
भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे
कर्णावाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः।
अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः
चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवन वपुषं विष्णुमीशं नमामि॥२॥
ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥३॥
मेघश्यामं पीतकौशेयवासं
श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम्।
पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं
विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम्॥४॥
नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे॥५॥
सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं
सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् |
सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं
नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥६॥
छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि
आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलंकृतम् |
चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं
रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये॥७॥

॥स्तोत्रम्‌ ॥
॥हरिः ॐ॥


विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च॥२॥
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः॥३॥
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः।
संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः॥४॥
स्वयंभूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः॥५॥
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः॥६॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम्॥७॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः॥८॥
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्॥९॥
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः॥१०॥
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः॥११॥
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः॥१२॥
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः।
अमृतः शाश्वत स्थाणुर्वरारोहो महातपाः॥१३॥
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः॥१४॥
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः॥१५॥
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः॥१६॥
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः।
अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः॥१७॥
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः॥१८॥
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक्॥१९॥
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः॥२०॥
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः॥२१॥
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा॥२२॥
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः॥२३॥
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्॥२४॥
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः संप्रमर्दनः।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः॥२५॥
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः॥२६॥
असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः॥२७॥
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः॥२८॥
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः॥२९॥
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः॥३०॥
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः॥३१॥
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः॥३२॥
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित्॥३३॥
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः॥३४॥
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः॥३५॥
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः॥३६॥
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः॥३७॥
पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत्।
महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः॥३८॥
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः॥३९॥
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः॥४०॥
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः॥४१॥
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः॥४२॥
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः। or विरामो विरतो
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः॥४३॥
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः॥४४॥
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः॥४५॥
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः॥४६॥
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः॥४७॥
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम्॥४८॥
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत्।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः॥४९॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः॥५०॥
धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः॥५१॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः॥५२॥
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः॥५३॥
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्त्वतांपतिः॥५४॥
जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः॥५५॥
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः॥५६॥
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत्॥५७॥
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः॥५८॥
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणोऽच्युतः।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः॥५९॥
भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः॥६०॥
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः।
दिवःस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः॥६१॥
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक्।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्॥६२॥
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः॥६३॥
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः॥६४॥
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः॥६५॥
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः।
विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः॥६६॥
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः॥६७॥
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः॥६८॥
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः॥६९॥
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनंजयः॥७०॥
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः॥७१॥
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः॥७२॥
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः॥७३॥
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः॥७४॥
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः॥७५॥
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः॥७६॥
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान्।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः॥७७॥
एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम्।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः॥७८॥
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः॥७९॥
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक्।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः॥८०॥
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः॥८१॥
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात्॥८२॥
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा॥८३॥
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः॥८४॥
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी॥८५॥
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः॥८६॥
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः।
अमृतांशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः॥८७॥
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः।
न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः॥८८॥
सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः॥८९॥
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान्।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः॥९०॥
भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः॥९१॥
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः॥९२॥
सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः॥९३॥
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः॥९४॥
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः॥९५॥
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः॥९६॥
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः॥९७॥
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः॥९८॥
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः॥९९॥
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः॥१००॥
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः॥१०१॥
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः॥१०२॥
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः॥१०३॥
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः॥१०४॥
यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च॥१०५॥
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः॥१०६॥
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः॥१०७॥
सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति।
वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी।
श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु॥१०८॥
श्री वासुदेवोऽभिरक्षतु ॐ नम इति।

॥उत्तरन्यासः॥

भीष्म उवाच ---
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम्॥१॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत्।
नाशुभं प्राप्नुयात्किंचित्सोऽमुत्रेह च मानवः॥२॥
वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत्।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात्॥३॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात्।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाम्॥४॥
भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत्॥५॥
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥६॥
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति।
भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः॥७॥
रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात्।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः॥८॥
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम्।
स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः॥९॥
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम्॥१०॥
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते॥११॥
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः।
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः॥१२॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः।
भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे॥१३॥
द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः।
वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः॥१४॥
ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम्।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम्॥१५॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः।
वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च॥१६॥
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः॥१७॥
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम्॥१८॥
योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्याः शिल्पादि कर्म च।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात्॥१९॥
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः।
त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः॥२०॥
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम्।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च॥२१॥
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम्।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम्॥२२॥
न ते यान्ति पराभवम ॐ नम इति।

अर्जुन उवाच ---
पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम।
भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन॥२३॥

श्रीभगवानुवाच ---
यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव।
सोहऽमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः॥२४॥
स्तुत एव न संशय ॐ नम इति।

व्यास उवाच ---
वासनाद्वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम्।
सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते॥२५॥
श्री वासुदेव नमोऽस्तुत ॐ नम इति।

पार्वत्युवाच ---
केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम।
पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो॥२६॥

ईश्वर उवाच ---
श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने॥२७॥
श्रीरामनाम वरानन ॐ नम इति।

ब्रह्मोवाच ---
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये
सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते
सहस्रकोटि युगधारिणे नमः॥२८॥
सहस्रकोटि युगधारिणे ॐ नम इति।

सञ्जय उवाच ---
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥२९॥

श्रीभगवानुवाच ---
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥३०॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥३१॥
आर्ताः विषण्णाः शिथिलाश्च भीताः घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः।
संकीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्तु॥३२॥
कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात्।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि॥३३॥

॥इति श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रं संपूर्णम्॥
॥ॐ तत सत॥




ॐ आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥
आर्तानामार्तिहन्तारं भीतानां भीतिनाशनम्।
द्विषतां कालदण्डं तं रामचन्द्रं नमाम्यहम्॥
नमः कोदण्डहस्ताय सन्धीकृतशराय च।
खण्डिताखिलदैत्याय रामायऽऽपन्निवारिणे॥
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥
अग्रतः पृष्ठतश्चैव पार्श्वतश्च महाबलौ।
आकर्णपूर्णधन्वानौ रक्षेतां रामलक्ष्मणौ॥
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन ममाग्रतो नित्यं रामः पातु सलक्ष्मणः॥
अच्युतानन्तगोविन्द नामोच्चारणभेषजात।
नश्यन्ति सकला रोगास्सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥
सत्यं सत्यं पुनस्सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते।
वेदाच्छास्त्रं परं नास्ति न देवं केशवात्परम्॥
शरीरे जर्झरीभूते व्याधिग्रस्ते कळेवरे।
औषधं जाह्नवीतोयं वैद्यो नारायणो हरिः॥
आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणो हरिः॥
यदक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं तु यद्भवेत।
तत्सर्व क्षम्यतां देव नारायण नमोऽस्तु ते॥
विसर्गबिन्दुमात्राणि पदपादाक्षराणि च।
न्यूनानि चातिरिक्तानि क्षमस्व पुरुषोत्तम्॥





नमः कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने।
नमस्ते केशवानन्त वासुदेव नमोऽस्तुते॥
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविंदाय नमो नमः॥
आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्।
सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति॥
एष निष्कंटकः पन्था यत्र संपूज्यते हरिः।
कुपथं तं विजानीयाद् गोविन्दरहितागमम्॥
सर्ववेदेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम्।
तत्फलं समवाप्नोति स्तुत्वा देवं जनार्दनम्॥
यो नरः पठते नित्यं त्रिकालं केशवालये।
द्विकालमेककालं वा क्रूरं सर्वं व्यपोहति॥
दह्यन्ते रिपवस्तस्य सौम्याः सर्वे सदा ग्रहाः।
विलीयन्ते च पापानि स्तवे ह्यस्मिन् प्रकीर्तिते॥
येने ध्यातः श्रुतो येन येनायं पठ्यते स्तवः।
दत्तानि सर्वदानानि सुराः सर्वे समर्चिताः॥
इह लोके परे वापि न भयं विद्यते क्वचित्।
नाम्नां सहस्रं योऽधीते द्वादश्यां मम सन्निधौ॥
शनैर्दहन्ति पापानि कल्पकोटिशतानि च।
अश्वत्थसन्निधौ पार्थ ध्यात्वा मनसि केशवम्॥
पठेन्नामसहस्रं तु गवां कोटिफलं लभेत्।
शिवालये पठेनित्यं तुलसीवनसंस्थितः॥
नरो मुक्तिमवाप्नोति चक्रपाणेर्वचो यथा।
ब्रह्महत्यादिकं घोरं सर्वपापं विनश्यति॥
विलयं यान्ति पापानि चान्यपापस्य का कथा।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥

॥हरिः ॐ तत्सत्॥